Tuesday, 20 February 2018

नीत के दोहे


आपस में दूरी रहे, हो कोई मतभेद, यह सलाह है आपको,मत रखिये मनभेद. कुभ्ह पाना है यदि हमें, जग में पाना नाम, दुष्प्रवृति, हिंसा, व्यसन, छोड़े ऐसे काम.

Thursday, 4 January 2018


जिसकी बुद्धि प्रखर होती है,वही व्यक्ति मेधावी होता, मेधावी ही आगे बढ़ कर, प्रज्ञावान प्रभावी होता l अगर विवेकी बनना है तो, बस सत्संग सदा आवश्यक, गुणी, पारखी और विवेकी, वह ही प्रतिभा शाली होता l

जिसकी बुद्धि प्रखर होती है,वही व्यक्ति मेधावी होता,


जिसकी बुद्धि प्रखर होती है,वही व्यक्ति मेधावी होता, मेधावी ही आगे बढ़ कर, प्रज्ञावान प्रभावी होता l अगर विवेकी बनना है तो, बस सत्संग सदा आवश्यक, गुणी, पारखी और विवेकी, वह ही प्रतिभा शाली होता l

Thursday, 28 December 2017

फासला घट आयगा, हमदम बनाओ

 फासला घट  आयगा, हमदम  बनाओ,
 हो सके तो तुम किसी का गम मिटाओ l 
शान्ति, सुख पा  जावगे यह देखना तुम,
बस किसी  के  घाव पर मरहम लगाओ l

- डॉ हरिमोहन गुप्त 
सुख उसको ही मिल सका, रहा कामना मुक्त, वही सम्पदा श्रेष्ठ है, वैभव से हो युक्त. मिथ्या भाषण, कटु वचन, करे तीर का काम, स्वाभाविक यह प्रतिक्रिया, उल्टा हो परिणाम.

जब अधर्म बढ़ता धरती पर

जब अधर्म बढ़ता  धरती  पर, कोई  सन्त पुरुष  आता है,
हमको ज्ञान मार्ग   दिखलाने, भारत  ही  गौरव  पाता  है l
संत अवतरित  हुये  यहाँ पर, विश्व बन्धु  का  पाठ पढ़ाने,

उसका फल हम सबको मिलता, जन जन उनके गुण गाता है l 

- डॉ हरिमोहन गुप्त 

Tuesday, 5 December 2017

जेब से भारी थे, मूंमफली के दाने भी

जेब से भारी  थे, मूंमफली  के दाने भी,

कैसे समझाएं हम, अपने अब बच्चों को l 

Sunday, 3 December 2017

यों ही कोई बदनाम नहीं होता

यों ही  कोई  बदनाम  नहीं होता,
वे बजह कोई गुमनाम  नहीं होता l
गलत इरादे यदि चित्त में हों कभी,
तो कोई भी शुभ काम नहीं होता 

- डॉ. हरिमोहन गुप्त 

Tuesday, 28 November 2017

जुगनू जैसा है प्रकाश

जुगनू जैसा है प्रकाश बस,
मिटा न तिल भर भी अँधियारा ,
गर्व बढाया मन में इतना,
सूरज को तुमने ललकारा।
        यह गर्वोक्ति न ले लो मन में,
        तुम्हीं बड़े हो सारे जग में,
        यहाँ किसी ने भी नापी थी,
        सारी धरती को इक पल में।
इसीलिये तुमसे कहता हूँ,
बाँट सको बाँटो उजयारा।
         अंहकार ही था रावण को,
         स्वर्ग नसेनी लगवाउगा,
         मैं त्रैलोक्य जीत कर पल में,
         विजय पताका फहराउगा।
वह रावण भी नहीं रह सका,
सागर तो अब भी है खारा।
           बहुत बड़ा हूँ सागर ने जब,
           अंहकार मन में उपजाया,
           ऋषि अगस्त ने एक घूँट में,
           सोख लिया, उसको समझाया।
           
जग में ऐसे बहुत लोग हैं ,
जिनने बदली युग की धारा।     
           मृत्यु जीतने के ही भ्रम में,
           छै पुत्रों को जिसने मारे,
           नहीं सफल हो पाया फिर भी,
           वह विपत्ति को कैसे टारे।
नहीं कंस रह पाया जग में,
और कृष्ण ने उसे पछाड़ा।
            परोपकार का भाव रहे तो,
            हो जाये ज्योर्तिमय यह जग,
            अंधकार हो दूर जगत से,
            रहे प्रकाशित अब सारा जग।
सूरज ने तम को हरने हित,
जलना ही उसने स्वीकारा।
इसीलिये तुमसे कहता हूँ 
बाँट सको बाँटो उजयारा।

- डॉ. हरिमोहन गुप्त